प्रारम्भिक शिक्षा

भारत में 6 से 14 वर्ष की आयु वर्ग के बच्चों को दी जाने वाली शिक्षा को प्रारम्भिक शिक्षा कहा जाता है। इन वर्षों को बच्चों के लिए महत्वपूर्ण बुनियादी वर्ष माना जाता है, जब उनके जीवन की आधारभूत बातें सुदृढ़ता प्राप्त करती है, उनका व्यक्तितत्व कौशल, उनकी समझ, भाषागत योग्यता, परिष्कृत रचनात्मकता आदि विकसित होते हैं।

आज प्रारम्भिक स्तर पर सभी मान्यता प्राप्त विद्यालयों में से 80% विद्यालय सरकार द्वारा संचालित या समर्थित हैं, जिसके कारण भारत शिक्षा प्रदान करने वाला सबसे बड़ा देश है। निशुल्क और अनिवार्य शिक्षा अधिनियम 2009 के अनुसार 6 से 14 वर्ष की आयु वर्ग के सभी बच्चों को विद्यालयों में मुफ्त और अनिवार्य प्रवेश, उपस्थिति और प्रारम्भिक शिक्षा को पूरा करने के मौलिक अधिकार को एक क़ानूनी स्वरुप प्रदान करता है, फिर भी नामांकन करने वाले और अपनी प्रारम्भिक स्कूली शिक्षा पूरी करने वाले बच्चों के बीच एक संख्यात्मक अंतर है।

संज्ञानात्मक विकास, प्रारम्भिक भाषा और गणित एवं सामाजिक व भावनात्मक विकास सम्बन्धी बच्चों के प्रदर्शन पर उनकी आयु का भी प्रभाव हैं, इसलिए बड़े बच्चे, छोटे बच्चों की तुलना में अधिक सवाल सही हल कर पाते है। बच्चों की प्रारम्भिक भाषा और गणित के प्रदर्शन पर उनके संज्ञानात्मक कौशल का प्रभाव दिखाई देता है। इससे यह संकेत मिलता है कि प्रारम्भिक वर्षों में बच्चों को सिखाने में संज्ञानात्मक कौशल के विकास पर ध्यान देना चाहिए न कि किताबी या विषय आधारित ज्ञान पर। इससे बच्चों को भविष्य में भरपूर लाभ प्राप्त हो सकेगा।

4-8 वर्ष आयु वर्ग के बच्चों को एक साथ सतत क्रम में देखना चाहिए। कक्षा व पाठ्यक्रम का निर्माण इसको ध्यान में रखकर करना चाहिए तथा एक प्रभावी और लागू करने योग्य पाठ्यक्रम के लिए डिजाइनिंग ,प्लानिंग, पायलटिंग और अंतिम रूप देने की प्रक्रिया को जमीनी वास्तविकताओं को ध्यान में रखकर निर्धारित किया जाना चाहिए।

‘विद्या भारती अखिल भारतीय शिक्षा संस्थान’ अखिल भारतीय स्तर पर प्रारम्भिक शिक्षा को बाल केन्द्रित क्रिया आधारित करवाने पर बल दे रही है तथा इसके लिए लगातार प्रयास कर रही है। प्रारंभ से ही शिशु मंदिर योजना में इस बात का आग्रह रहा है कि अध्ययन अध्यापन बाल केन्द्रित, गतिविधि आधारित तथा आनंददायी हो।

प्रारम्भिक शिक्षा की गुणवता बढ़े इसके लिए विद्या भारती लगातार प्रयास कर रही है। पिछले दो तीन वर्षों से प्रारम्भिक शिक्षा की गुणवता में बढौतरी देखने को मिल रही है। विद्या भारती हरियाणा पिछले तीन चार वर्षों से प्रारम्भिक शिक्षा को बाल केन्द्रित व क्रिया आधारित बनाने पर जोर दे रही है। पिछले एक दो वर्षों से विद्या भारती हरियाणा के विद्यालयों की प्रारम्भिक कक्षाओं में बहुत सुधार देखा गया है। आज बच्चे कक्षा कक्षों से बाहर जाकर अपने विषयों को सीख रहे है। आज बच्चों को सीखने के लिए वातावरण तैयार किया जा रहा है। सभी आचार्य अपनी जी जान लगाकर बच्चों को केंद्र में रखकर अपनी पाठ योजनाएं तैयार कर रहे है।

सभी विद्यालयों के आचार्य बच्चों के बस्ते का बोझ कम करने के लिए विभिन्न प्रकार के प्रयोग कर रहे हैं। सभी आचार्य तथा विषय आचार्य अपनी कक्षा के बच्चों के स्तर के अनुसार विभिन्न प्रकार की गतिविधियाँ तथा शिक्षण सहायक सामग्री का निर्माण कर रहे है। विभिन्न प्रकार की गतिविधियों एवं शिक्षण सहायक सामग्री के प्रयोग से बच्चों के सीखने की क्षमता में विकास हुआ है। अब बहुत से विद्यालयों में विषय को समझने के लिए बच्चों के लिए Out of walls, field trips, विषय अनुसार बाल सभाएं, छात्र संसद, कहानी, नाटक ,पाठ का कक्षा कक्ष में अभिनय द्वारा समझना, संवाद, सुलेख, श्रुतलेख, दृश्य श्रृव्य उपकरणों का उपयोग, गिनती, पहाड़े, कविता, गीत, बारहखड़ी का कई तरीकों से प्रयोग किया जा रहा है।

आधारभूत विषयों के क्रियान्वन हेतु समय सारणी में विद्या भारती की योजना के अनुसार कालांशों की व्यवस्था की जा रही है। विद्यालयों में पुस्तकालय, वाचनालय, लैब, कंप्यूटर, गणित दीवार, गणित पार्क आदि में बढौतरी की जा रही है जिनसे बच्चों को सीखने के अवसर प्राप्त हो रहें है।

प्रारम्भिक कक्षाओं में प्रशिक्षित एवं योग्य आचार्य होने के कारण आचार्य हर विषय को बारीकी से समझकर, बच्चे को केंद्र में रखकर उसके लिए परिस्थितियाँ तैयार करने का कार्य कर रहे है जिससे बच्चे स्वयं सीखने के लिए प्रेरित हो रहे है। आज लगभग प्रत्येक विद्यालय द्वारा बालिकाओं की काउंसलिंग की व्यवस्था, सामान्य स्वास्थ्य शिक्षा, नियमित स्वास्थ्य परीक्षण तथा प्रत्येक बच्चे का वर्ष में दो बार बैटरी टेस्ट किया जा रहा है जिससे बच्चों की प्रतिरोधक क्षमता का विकास हो रहा है। आज जहाँ नगरीय विद्यालयों में भी बच्चों द्वारा स्लेट का प्रयोग किया जा रहा है वही ग्रामीण क्षेत्रों में हमारे परम्परागत भारतीय खेलों का प्रशिक्षण दिया जा रहा है।

प्रारम्भिक कक्षाओं में विद्यार्थियों के सर्वांगीण विकास हेतु जितनी अधिक गतिविधियाँ एवं प्रतियोगिताएं करवाई जाएगी बच्चों को सीखने के उतने ही ज्यादा अवसर मिलते जायेंगे। इसलिए हम सबको सिर्फ परिस्थितियां तैयार करनी है जिससे बच्चा स्वयं सीख सके।

स्वामी विवेकानन्द जी ने कहा है – “जैसा तुम सोचते हो, वैसे ही बन जाओगे। खुद को निर्बल मानोगे तो निर्बल और सबल मानोगे तो सबल ही बन जाओगे।” ठीक इसी प्रकार यदि एक आचार्य किसी छात्र को निर्बल समझेगा तो वो निर्बल और यदि उसको सबल समझेगा तो वो सबल ही बनेगा। इसलिए एक अच्छे आचार्य को अपने सभी छात्र सबल ही दिखने चाहिए ताकि भविष्य में वो छात्र हमारे देश के सबल योद्धा एवं नागरिक बन कर हमारे राष्ट्र का नाम रोशन कर सके।